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सनातन धर्म की आत्माएं हैं सभी की पूर्वज – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी…. पितृपक्ष श्राद्ध में भोग लगाकर देवी-देवता सहित सभी पूर्वजों को किया याद…

सादर प्रकाशनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
सनातन धर्म की आत्माएं हैं सभी की पूर्वज – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
पूर्वज आत्मा के स्वमान से क्षमा और रहम की भावना होगी जागृत
पितृपक्ष श्राद्ध में भोग लगाकर देवी-देवता सहित सभी पूर्वजों को किया याद…
मानसिक तकलीफ दूर करने कराया गया क्षमादान योग अभ्यास

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Baloda News…

टिकरापारा :- आत्मा अजर-अमर अविनाशी है और शरीर विनाशी है। आत्मा अपनी यात्रा में अनेक बार शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। सृष्टि के आदि सतयुग और त्रेतायुग में सिर्फ आदि सनातन देवी-देवता धर्म का ही राज्य था। द्वापरयुग से अन्य धर्मों का आना शुरू होता है। इस दौरान जन्म-जन्म उसके पाप व पुण्य कर्मां का खाता तैयार होता जाता है। इस यात्रा में आत्मा किसी को दुख, तकलीफ देती है और कहीं पर उसे भी दुख, तकलीफ, धोखा मिलता है। इस कलयुग में आत्मा अपनी अंतिम यात्रा में है जहां उसके बहुत से पाप व पुण्य कर्म जमा हो गए हैं। अतः इस समय स्वयं को हल्का रखने के लिए पूर्वज आत्मा का स्वमान लेना चाहिए।
उक्त बातें पितृ पक्ष श्राद्ध के अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में आयोजित कार्यक्रम में सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। दीदी ने ज्ञानमुरली क्लास में पूर्वज का भावार्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि पूर्वज आत्मा किसी वृक्ष के जड़ व तने के समान है जिनके द्वारा पेंड़ के हर पत्ते को शक्ति मिलती है। हम सनातन धर्म की आत्माएं भी सृष्टि रूपी कल्प वृक्ष की जड़ व तने के समान हैं। सर्व आत्माओं को शक्ति व शांति देने की जिम्मेदारी हमारी है। जब हम पूर्वज आत्मा का स्वमान लेते हैं तब हमारे भीतर प्रेम, क्षमा और रहम की भावना जागृत होती है।
मानसिक तकलीफ व तनाव से मुक्ति के लिए करें क्षमादान योग…
दीदी ने बतलाया कि कई बार हमें बिना गलती के ही तनाव या भारीपन महसूस होता है इसके पीछे कारण हमारे पिछले विकर्म होते हैं। क्षमादान योग जिसमें हम अपनी गलतियों के लिए सूक्ष्म रूप से दूसरों से क्षमा मांग लेते हैं और दूसरों की गलतियों को क्षमा कर देते हैं इससे आत्मा मानसिक तकलीफों व बोझ से मुक्त हो जाती है और शांति व हल्केपन की अनुभूति करती है।
ज्ञान का दान है सर्वोत्तम दान…
दीदी ने आगे बतलाया कि श्राद्ध पर दान करना पुण्य माना जाता है। संगमयुग पर ज्ञान के सागर परमात्मा जो हमें ज्ञान दे रहे हैं उसका दान करना सर्वोत्तम दान है क्योंकि इस ज्ञान दान से परमात्मा का सत्य परिचय मिलता है जिससे आत्मा सुख-शान्ति संपन्न दुनिया में जाने की अधिकारी बन जाती है।
निमित्त भाव, निर्माण स्वभाव और निर्मल वाणी से मिलेगी संगठन में सफलता…
दीदी ने सत्संग में आगे कहा कि संगठन में टकराव का कारण है कि हम स्वयं व दूसरों के पूर्वज पन को नहीं देख पाते अर्थात् ओरिजनल दिव्यगुणों से सम्पन्न स्वरूप को भूल जाते हैं और उनसे केवल वर्तमान के स्वभाव-संस्कार को देखते हुए व्यवहार करते हैं। संगठन में सफलता के लिए तीन विशेषताएं चाहिए – निमित्त भाव, निर्माण स्वभाव और निर्मल वाणी। पर-चिंतन, पर-दर्शन व परमत को छोड़ परोपकारी बनने की बात कही।
श्राद्ध के अवसर पर ईश्वर को याद करते हुए मेडिटेशन कॉमेन्ट्री के माध्यम से पूर्वजों का आह्वान कर सुबह व शाम दोनों सत्रों में भोग स्वीकार कराया गया और क्षमादान योग का अभ्यास भी कराया गया। कार्यक्रम में टिकरापारा, राजकिशोर नगर, मस्तूरी, सरसेनी आदि स्थानों से आए साधक उपस्थित रहे।

Source: BK Global News Feed

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