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स्वर्णिम समाज की स्थापना में योग का योगदान

21 जून योग दिवस पर विशेष

किसी भी समाज की सशक्तता का आधार उसकी मूल इकाई है व्यक्ति। जब मानव चारित्रिक, मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और नैतिक रूप से मजबूत होगा, तभी सशक्त समाज का निर्माण हो सकता है। किसी भी असहाय, दुखी, गरीब व्यक्ति की धन, कपड़ा, अन्न आदि की सहायता करके कुछ दिनों के लिए उसका सहयोग किया जा सकता है। उस व्यक्ति को इस योग्य बना देना कि वह मानसिक और शारीरिक रूप से समर्थ बने ताकि स्वयं ही अपने जीवन का निर्माण कर सकें। यही सच्ची समाज सेवा है। यह सब संभव है व्यक्ति को योग युक्त जीवन शैली सिखाना। इस शैली से जीवन जीते हुए व्यक्ति स्वयं को और समाज दोनो को सशक्त करने में मजबूत आधार प्रदान करता है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के द्वारा सिखाए गए योग से लाखों भाई बहन देश और विदेश में स्वयं चारित्रिक, नैतिक आर्थिक रूप से मजबूत बनकर स्वर्णिम समाज के निर्माण में योगदान दे रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाता है । यह दिन वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और योग मनुष्य को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया। इसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी। उन्होंने कहा था-” योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है।

योग शब्द का अर्थ है समाधि अर्थात चित्त वृत्तियों का निरोध । गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है योग कर्मसु कौशलम् अर्थात कर्मों में कुशलता ही योग है।

पातंजलि योग दर्शन के अनुसार चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष एवं प्रकृति के पार आत्म का स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है

विष्णु पुराण के अनुसार जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिल हीं योग है।

भगवत गीता के अनुसार दुख – सुख लाभ-अलाभ शत्रु – मित्र आदि गुणों में सर्वत्र समभाव रखना ही योग है

बौद्ध धर्म के अनुसार चित्त की एकाग्रता ही योग है।

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा सिखाया जाने वाला प्राचीन राजयोग सभी योग का राजा कहलाता है । यह न केवल मन पर नियंत्रण सिखाता है अपितु स्वयं का परिचय देकर परमात्मा से मिलन की विधि बताता है । यह ऐसा योग है जो मनुष्य को हर परिस्थिति में संयमित रहना सिखाता है ।

पतंजलि व्यापक रूप से औपचारिक योग दर्शन के संस्थापक माने जाते हैं पतंजलि में अष्टांग योग का वर्णन किया गया है जिसके 8 अंग होते हैं।

1. यम अर्थात 5 परिहार – अहिंसा , झूठ नहीं बोलना, लोभ छोड़ना , विषय आसक्ती छोड़ना और आत्म नियंत्रण।

2. नियम 5 प्रकार की नियम धारण करना -पवित्रता, संतुष्टता, तपस्या ,अध्ययन और भगवान को आत्मसमर्पण।

3. आसन अर्थात संपूर्ण पवित्र होकर शुद्ध आसन पर बैठकर भगवान का ध्यान करना ।

4. प्राणायाम प्राण /सांस का आयाम करना, नियंत्रित करना। जिससे जीवन शक्ति बढ़ती है ।

5. प्रत्याहार अर्थात बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों वैभव से आकर्षण मुक्त होना।

6. धारणा अर्थात एकाग्र होकर एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना ।

7. ध्यान ध्यान की वस्तु अर्थात आत्मा और परमात्मा का गहन चिंतन करना।

8. समाधि यह योग की चरम अवस्था है। इस स्थिति में आत्मा परमात्मा के में लीन हो जाती है। मुक्ति जीवनमुक्ति की ओर अग्रसर होती है ।

श्रीमद्भागवतगीता में भी योग के तीन प्रकार बताएं है-
कर्मयोंग
भक्ति योग
ज्ञानयोग
तो आइए आज से ही हम लोग को अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाएं और समस्त प्रकार के रोग से दूर होकर अपने स्वस्थ जीवन शैली जिए।

1. स्वस्थ जीवन शैली के लिए अपने जीवन में नियम बनाएं प्रातः काल 4:00 बजे उठकर योग, ध्यान प्राणायाम ,व्यायाम आदि गतिविधियां करे।

2. सप्ताह में दो दिन फलाहार या एक दिन उपवास पर रहे।

3. मन में सबके प्रति प्रेम, विश्वास, सहयोग, रहम और सद्भावना रखें। यह सुखी रहने का सबसे बड़ा मंत्र है।

4. प्रतिदिन 30 मिनट व्यायाम अवश्य करे ।

5. रात्रि का भोजन कम से कम करें। यह सूर्यास्त के पहले हो तो बहुत अच्छा है। रात्रि को सोने से पहले ईश्वर का धन्यवाद करें और 10:00 बजे तक अवश्य सो जाए ।

6. प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा सिखाए जाने वाले राजयोग को अपने जीवन में अवश्य अपनाएं।

7. शुद्ध शाकाहारी बने, शारीरिक और मानसिक शुद्धता और पवित्रता जीवन का अनिवार्य अंग बने।

इस प्रकार योग युक्त प्रकार की दिनचर्या को अपने जीवन में अपनाते हैं तो आंतरिक और बाहरी सुख शांति की प्राप्ति हमें होती है । जीवन की मनचाही ऊंचाइयों को हम छूते हैं। मनुष्य जीवन को सार्थक करते हुए जीवन अनमोलता के साथ हम जीते हैं।

Source: BK Global News Feed

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