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पिताश्री ब्रह्माबाबा की पुण्यतिथि विश्व शान्ति दिवस पर ज्ञान-योग-साधना का दूसरा दिन

सादर प्रकाशनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
सबके प्रति प्यार की भावना हो, गुस्सा स्वयं व दूसरों को दुखी करता है…
इस ठण्ड के समय में स्वयं को आलस्य से बचाएं,
पिताश्री ब्रह्माबाबा की पुण्यतिथि विश्व शान्ति दिवस पर ज्ञान-योग-साधना का दूसरा दिन

बिलासपुर टिकरापारा :- ब्रह्माकुमारीज़ के साकार संस्थापक पिताश्री ब्रह्माबाबा की 52वीं पुण्यतिथि पर टिकरापारा सेवाकेन्द्र में आयोजित दो दिवसीय ज्ञान-योग-साधना कार्यक्रम के दूसरे दिन की दिनचर्या में मौन साधना, माउण्ट आबू से लाइव सत्संग व शाम के समय में प्रभु-मिलन कार्यक्रम में साधक जन शामिल हुए।
सत्संग से अनेक श्रेष्ठ विचार सुनने को मिले जिसमें वरिष्ठ दीदीयों ने बतलाया कि परमात्मा को प्यार का सागर कहते हैं यदि हम इस स्मृति में रहें कि हम उनके बच्चे हैं तो सभी के प्रति हमारा व्यवहार प्यार भरा हो जाएगा। भगवान को हम बच्चों का गुस्सा करना अच्छा नहीं लगता। गुस्सा करने से खुद भी दुखी होते और दूसरों को भी दुखी करते हैं। महान बनने के लिए पिताश्री ब्रह्माबाबा और मातेश्वरी जी के पदचिन्हों पर चलना होगा, कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण अर्थात् अधिक खाने-पीने की लालच न हो, कटु बोल न निकले, किसी के प्रति कुदृष्टि न हो, ज्यादा इच्छा नहीं रखनी है, चलन सुधारना, देह का अहंकार छोड़ना और सहनशीलता का गुण धारण करना होगा।
रात्रि में सोने से पूर्व अपनी दिनचर्या का चार्ट रखें, चेक करें कि आज किसी को दुख तो नहीं दिया, भगवान की याद में कितने समय रहा, समय व्यर्थ तो नहीं गंवाया। अभी चारों तरफ का वातावरण योगयुक्त व युक्तियुक्त बनाएं रखें क्योंकि अभी के समय में तनाव बढ़ता ही जा रहा है। जैसे छोटी-छोटी प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान का टेंशन, कड़े नियमों को अपनाने का टेन्शन, व्यवहार में कमी का टेंशन और संबंधों में स्नेह की कमी से टेंशन का वातावरण और भी बढ़ेगा। जैसे शरीर की कोई नस खींच जाने पर कितनी परेशानी होती है, दिमाग की नस खींची हुई रहती है। ऐसे समय में मन में अनेक विचार आते हैं, असमंजस की स्थिति हो जाती है। कमाएं तो मुश्किल, न कमाएं तो मुश्किल, इकट्ठा करें तो मुश्किल न करें तो मुश्किल। ऐसी स्थितियों का सामना करने के लिए स्वयं को शक्तिशाली बनाना जरूरी है। प्रतिदिन मेडिटेशन व पॉज़िटिव थिंकिंग से आत्मा की बैट्री चार्ज करना, मजबूत बनाना अतिआवश्यक है।
स्वयं पर रखें कड़ी नजर, आलस्य से बचें…
आलस्य, थकान, कमजोरी को अपने अंदर आने न दें। ‘आज बहुत ठण्ड है, थकान है, सिर में दर्द है, आज सो जाता हूं, सत्संग नहीं करता’ ऐसे विचार अवनति की ओर ले जाते हैं। इसके लिए स्वयं पर कड़ी नजर रखना जरूरी है। कभी-भी पुरूषार्थ में ढ़ीलापन नहीं लाना है।
स्नेह में कमजोरियों को छोड़ना आसान होता है…
स्नेह की निशानी है कुर्बानी। जिससे प्यार होता है उसके लिए मुश्किल या असंभव लगने वाली बातें भी सहज संभव लगती हैं। त्याग त्याग नहीं लगता। इसी प्रकार यदि भगवान से प्यार है तो कमजोरियों को आसानी से छोड़ा जा सकता है। सच्चा तपस्वी एक पतिव्रता स्त्री की तरह होता है जो स्वप्न या सोच में भी उस ईश्वर के अतिरिक्त किसी और को याद नहीं करता।
सभी ने पिताश्री के यादगार शान्ति स्तम्भ और बाबा की कुटिया में जाकर अपनी मौन श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी, अन्य बहनें एवं अनेक भाई-बहनें शामिल रहे।

Source: BK Global News Feed

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