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Fear of future or focus on future

Youth age brings maturity in thoughts, deeds and actions. They become more conscious about their future life. Their parents and their surroundings start comparing them with others who are either successful or failure and they keep pinching them to create a better future.

It is up to us to fear from our future or focus on the future. Fear of the future creates a web of weak thoughts which forces a soul to asphyxiate the divine intellect. Fear leads towards failure. Fear suppresses our energy, enthusiasm and eagerness to work. Fear doesn’t allow the right thinking for the actions required to build our future.

To get rid of the fears of the future, one should focus on the present state of mind of one’s thoughts and make efforts to keep these thoughts positive. You should start small acts that build confidence in you. Keep working towards one direction, your goal. You must know also that the future cannot be built in a day or in a year. It is said: “You are not responsible for your position at the age of 20 but you are responsible at the age of 35”. In order to design your own future, you need to keep balance on your acts and deeds to be done during this period.

Divide the future road map into phases. Like first finishing education, then getting a job or settling in business, handling family etc. As you keep moving in the right direction, things will be getting clearer. Sometimes you may find yourself inside a mist, then pause for a moment. Take advice, share with someone reliable.

The positive present is the seed of a successful future. Face it rather fear.


भविष्य की चिन्ता या भविष्य का चिन्तन

युवावस्था की ओर जैसे-जैसे कदम बढ़ने लगते है, स्वभावत: विचारों में, बोल में और कर्मों में एक तरह की परिपक़्वता आने लगती है। इन्हीं दिनों, युवा अपने भविष्य के स्वप्नों का ताना-बाना बुनने लगते हैं। तो दूसरी ओर, उनके माता-पिता, सगे-सम्बन्धी उनकी तुलना औरों के साथ कर उन्हें उनके बेहतर भविष्य को लेकर आये दिन सजग करते रहते हैं।

तो यह हम पर निर्भर करता है कि, ऐसे नाजुक वक्त क्या हम अपने भविष्य को लेकर चिन्ता में डूब भय में जीते रहें या फिर उसका शुभ-चिंतन करें। किसी भी प्रकार का भय मानव-मन को कमजोर कर सदसद्विवेक को भी अवरोधित करता है। भय हमारे मनोबल का, उमंग-उत्साह तथा उल्हास का हनन करता है; हमारी यथार्थ सोच को बाधित कर हमारे सुनहरे भविष्य के लिए उपयुक्त कर्मों पर रोक लगाता हैं। परिमाणस्वरूप यह मनोविकार विफलता का कारण बन जाता है।

तो हमें चाहिए कि, हम अपने मन में उत्पन्न विचारों की गुणवत्ता की गहराई से जाँच करें और लक्ष्यपूर्वक शुभ, श्रेष्ठ, सकारात्मक संकल्पों के निर्माण हेतु भरकस प्रयास करें। इसका शुभारंभ छोटी-छोटी बातों से करें ताकि हमारा आत्म-विश्वास भी बना रहें। इस तरह हमारे उज्ज्वल भविष्य की दिशा में धैर्यता के साथ एक-एक कदम अविरत बढ़ाते चलें; क्योंकि कहा जाता है की, आप अपने २० वर्ष की आयु के अवस्था के जिम्मेवार नहीं है किन्तु ३५ वर्ष की आयु में आप स्वयं की स्थिति के जवाबदेही जरूर है। हम अपने श्रेष्ठ भविष्य के लक्ष्य तथा उस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक लक्षण – इन दोनों में अन्तर न पायें।

अपने अन्तिम लक्ष्य को छोटे-छोटे उपलक्ष्यों (मील के पत्थरों) में विभाजित करें जैसे कि, पहले अपनी पढ़ाई पूरी करें; फिर कोई नौकरी या व्यवसाय की शुरूवात करें; तद्पश्चात परिवार को सँवारे आदि-आदि। जैसे-जैसे आप सहीं दिशा में आगे बढ़ते जायेंगे, अन्य बातें भी अपने आपही स्पष्ट होती जाएगी। राह चलते सम्भावत: अगर कभी आपको अपना लक्ष्य धुंधलासा नजर आये तो घबराइएगा नहीं; उस वक्त क्षणभर के लिए विश्राम लीजिए, परिस्थिति का विश्लेषण कीजिए और जरूरत हो तो अपनों के साथ विचार-विनिमय (राय-सलाह) कर आगे बढ़े।

आपका रचनात्मक वर्तमान आपके सकारात्मक भविष्य की नींव हैं। तो आओ चले अपनी मंजिल की ओर बिना रुके, बिना थके और बजाय कि मुँह मोडें, डट के सामना करें आनेवाली परिस्थितियों का।

Source: BK Global News Feed

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